रामनगर l कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ग्रासलैंड मैनेजमेंट को लेकर एक अहम ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किया जा रहा है, इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने ग्रासलैंड की अहमियत और उससे जुड़े खतरों पर चर्चा की, खासतौर पर, कॉर्बेट के जंगलों में तेजी से बढ़ रहे सेमल और मरोड़फली के पेड़ों को लेकर चिंता जताई गई है.

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ में ग्रासलैंड मैनेजमेंट को लेकर दो दिवसीय ट्रेनिंग प्रोग्राम का आयोजन किया गया है,वर्ल्ड वाइड फंड (WWF) के सहयोग से हो रहे इस कार्यक्रम में वनकर्मियों और अधिकारियों को ग्रासलैंड के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है. ग्रासलैंड जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं, ये क्षेत्र शाकाहारी जीवों की पहली पसंद होते हैं, जिन पर बाघ जैसे मांसाहारी जीव निर्भर रहते हैं, ऐसे में, ग्रासलैंड मैनेजमेंट किसी भी जंगल के लिए अनिवार्य हो जाता है,खासकर कॉर्बेट जैसे महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व के लिए।

मध्य प्रदेश से आए ग्रासलैंड विशेषज्ञों ने ट्रेनिंग के दौरान वन अधिकारियों को कॉर्बेट के ग्रासलैंड में आ रही नई चुनौतियों के बारे में बताया,उन्होंने खासतौर पर जंगल में तेजी से बढ़ रहे सेमल (Silk Cotton Tree) और मरोड़फली (Helicteres isora) के पेड़ों को लेकर चिंता जताई है.विशेषज्ज्ञों का कहना है कि”कॉर्बेट के ग्रासलैंड में सेमल और मरोड़फली जैसे पेड़ बढ़ रहे हैं, जो इन क्षेत्रों के लिए अनुकूल नहीं हैं।,ये पेड़ घास के बढ़ने में बाधा डालते हैं,
जिससे हिरण, चीतल और अन्य शाकाहारी जीवों को चारा नहीं मिल पाता,ऐसे में, इन जीवों की संख्या कम हो सकती है, जिससे बाघ जैसे मांसाहारी जानवरों को भी नुकसान होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इन पेड़ों के प्रसार को नियंत्रित नहीं किया गया, तो ग्रासलैंड की पारिस्थितिकी पर गहरा असर पड़ेगा।
इस स्थिति से निपटने के लिए सक्रिय वन प्रबंधन, नियंत्रित जलन (Controlled Burning), और प्राकृतिक घास के पुनर्विकास जैसी रणनीतियों पर काम किया जाना चाहिए.वहीं इस पर कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व के डायरेक्टर साकेत बडोला का कहना है कि”हमने विशेषज्ञों की सलाह को गंभीरता से लिया है और जल्द ही इन पेड़ों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे,हमारा मुख्य उद्देश्य कॉर्बेट के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखना है।”