दंतेवाड़ा l दंतेवाड़ा मुठभेड़ में ढेर हुई नक्सली लीडर रेणुका: 30 साल से थी सक्रिय, भाई गुडसा उसेंडी ने 2014 में किया था आत्मसमर्पण, लेकिन रेणुका ने नहीं छोड़ा संगठन
दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली है। सोमवार को हुई मुठभेड़ में 45 लाख रुपये की इनामी महिला नक्सली गुम्माडिवेली रेणुका उर्फ भानु उर्फ चैते उर्फ सरस्वती उर्फ दमयंती को ढेर कर दिया गया। रेणुका पर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 25 लाख और तेलंगाना सरकार द्वारा 20 लाख का इनाम घोषित था।

वकालत से नक्सलवाद की ओर: जब विचारधारा हावी हो गई
रेणुका एक होनहार छात्रा थी। उसने वकालत की पढ़ाई की थी और इसी दौरान प्रतिबंधित माओवादी संगठन के संपर्क में आई। उसे नक्सलियों की विचारधारा इतनी प्रभावित कर गई कि उसने कानून के रास्ते को छोड़कर हिंसा और विद्रोह का रास्ता अपना लिया। एक समय जो लड़की न्याय और संविधान की पढ़ाई कर रही थी, वही बाद में कानून और लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हो गई।
वह जल्द ही माओवादी संगठन के प्रचार तंत्र का अहम हिस्सा बन गई। उसे सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल रीजनल ब्यूरो (सीआरबी) प्रेस टीम की प्रभारी बना दिया गया और ‘प्रभात’ पत्रिका की संपादक के रूप में नियुक्त किया गया। उसका काम सरकार और सुरक्षाबलों के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाना, युवाओं को भड़काना और संगठन के लिए नए सदस्य जुटाना था। उसने कई जनजातीय इलाकों में जाकर माओवादी विचारधारा को फैलाया और सैकड़ों लोगों को संगठन से जोड़ने में मदद की।
भाई ने छोड़ा संगठन, लेकिन रेणुका डटी रही
रेणुका के भाई जीवीके प्रसाद उर्फ गुडसा उसेंडी उर्फ सुकदेव ने 2014 में नक्सली संगठन से नाता तोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया था। परिवार ने रेणुका से भी अपील की थी कि वह हिंसा का रास्ता छोड़कर वापस लौट आए, लेकिन उसने संगठन नहीं छोड़ा।
रेणुका के बड़े भाई राजशेखर, जो खुद भी अधिवक्ता हैं, अपनी बहन का शव लेने के लिए दंतेवाड़ा पहुंचे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “करीब 15 साल पहले रेणुका ने हमें एक चिट्ठी लिखी थी। उसमें उसने अपने हालात बताए थे, लेकिन हमने उसे लौटने के लिए समझाने की बहुत कोशिश की। इसके बाद, एक बार उसने फोन किया था और परिवार की स्थिति के बारे में जाना था, लेकिन फिर वह पूरी तरह से हमसे कट गई।”
छोटे भाई की बेबसी: 25 सालों से नहीं हुआ कोई संवाद
शव लेने पहुंचे भाई राजशेखर ने बताया कि पिछले 25 सालों से उनकी बहन से कोई बातचीत नहीं हुई थी। करीब 15 साल पहले उसने एक पत्र भेजकर परिवार का हालचाल पूछा था, लेकिन इसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ। परिवार को सोशल मीडिया के जरिए उसकी मौत की जानकारी मिली। राजशेखर की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा, “एक बहन, जो कभी हमारे साथ हंसती-खेलती थी, जिसने कानून की पढ़ाई की, वह कैसे इतनी बदल गई कि परिवार, समाज और अपने ही देश के खिलाफ हथियार उठा लिए? हम उसे खोजते रहे, इंतजार करते रहे, लेकिन वह वापस नहीं आई। और अब, हमें उसकी मौत की खबर सोशल मीडिया से मिली।”
सुरक्षाबलों को मिली बड़ी सफलता
दंतेवाड़ा में लगातार सुरक्षाबलों द्वारा नक्सल विरोधी अभियान चलाए जा रहे हैं। यह मुठभेड़ भी उसी अभियान का हिस्सा थी, जिसमें सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली। मुठभेड़ के बाद घटनास्थल से कई हथियार, नक्सली दस्तावेज और एक लैपटॉप भी बरामद किया गया है। पुलिस का कहना है कि वह संगठन में लंबे समय से सक्रिय थी और नक्सल प्रचार की अहम जिम्मेदारी संभाल रही थी।